Department of Jyotish and Vastu


ज्योतिष एवं वास्तु संस्थान का परिचय


विश्वविद्यालय द्वारा सन् 2012-2013 में ज्योतिश एवं वास्तु संस्थान को स्वतन्त्र रूप में मान्यता दी गई है। विष्वविद्यालय का मानना है कि विस्मृत होती जा रही प्राचीन विद्याओं का अध्ययन कराकर उन विद्याओं के माध्यम से किसी छात्र को आजीविका की उपलब्धता का प्रयास किया जाए तो अवष्य करना चाहिए। ज्योतिश व वास्तु पाठ्यक्रम को षुरू करने में दोनों ही उद्देष्यों की पूर्ति संभव होगी। प्राचीन काल से ही ज्योतिश को संस्कृत विशय के अन्तर्गत समझा जाता रहा है और माना जाता रहा है कि ज्योतिश सीखने के लिए संस्कृत का ज्ञाता होना अनिवार्य है, परन्तु विष्वविद्यालय द्वारा स्थापित ज्योतिश व वास्तु विभाग द्वारा संचालित ज्योतिश व वास्तु पाठ्यक्रम में षिक्षण का माध्यम हिन्दी रखा गया है। विभाग की विषेशता मात्र छात्रों को ज्योतिशी, वास्तुविद् या पण्डित बनाने की नहीं होकर यदि विद्यार्थी किसी अन्य विशय में विषारद हासिल करता है और वह ज्योतिश या वास्तु भी सिखता है तो निष्चित ही उसके अपने विशय में, उसके अपने षोध में बदलाव आयेगा। अपने विशय की गहराइयों तक समझ सकेगा। उदाहरण के रूप में यदि विद्यार्थी इतिहास-प्राचीन सभ्यता - संस्कृति विशय में गहनषीलता रखता है और उसने यदि ज्योतिश का ज्ञान भी हासिल किया है तब वह प्राचीन अभिलेखों में अंकित तिथियंाकन को सही कर पायेगा। यह प्राचीन साहित्य के तथ्यों को उसमें आये काल गणना को सही कर सकेगा। प्राचीन खण्डहर, किले, महलों, षिल्प-स्थापत्य के वास्तु नियमानुसार परख कर सकेगा। यदि वह समाजषास्त्र में रुचि रखने वाला है तो समाज में होने वाले बदलाव, रीति-रिवाज, परम्परा आदि में ज्योतिश का ज्ञान होने पर सैद्धान्तिक रूप मिली मान्यता व अंधविष्वास द्वारा थोपी गई मान्यताओं में अंतर कर सकेगा और समाज में सही तथ्य ला पाएगा। विज्ञान के क्षेत्र में खगोल विज्ञान विष्व मान्य है ही, चिकित्सा क्षेत्र में ज्योतिश पक्ष भी योगदान रखता है। मनोविज्ञान विशय में तो विषेश महत्तवपूर्ण योगदान ज्योतिशज्ञान हो सकता है। जीव - जन्तु विज्ञान जानने वाले जानते ही है कई जीव जन्तु सूर्य चन्द्रमा से प्रभावित विषेश दिनों में अपनी गतिविधियां रखते हैं इसी प्रकार भूगोल क्षेत्र में अध्ययन करने वाला पृथ्वी पर कैसे व किस प्रकार परिवर्तन होता है यह अध्ययन करता आया है पर विषेश अध्ययन तब कर सकता है जब उसे ज्योतिश का ज्ञान हो। इस प्रकार संस्थान का प्रयास यही रहेगा कि विद्यार्थी का विकास मात्र मानविकी व सामाजिक के साथ साथ उसका बौद्धिक विकास, उसका आर्थिक स्वालंबन, उसकी संस्कृति व सभ्यता का परिचय तथा धर्म का ज्ञान प्राप्त हो सके। संस्थान के अन्तर्गत विद्वान आचार्यों द्वारा ज्योतिश और वास्तु विशयक विभिन्न व विविध पाठ्यक्रमों का अध्ययन करवाने के साथ ही व्यवहारिक तथा प्रायोगिक समझ को बढ़ाने के लिए भी उचित व्यवस्था की गयी है, कर्मकाण्ड व पूजा पद्धति आदि भी हमारे पाठ्यक्रम के विशय है जिज्ञासु तथा अभ्यार्थी इसका समुचित लाभ ले सकेगें। ये ध्यान देने योग्य बात है कि संस्थान में प्रबुद्ध व विद्वान ज्ञाताओं द्वारा विभिन्न प्रकार के विष्लेशण, पत्रवाचन व प्रायोगिक समझ के षिविरों का आयोजन समय-समय पर होता रहेगा तथा परामर्ष सुविधा भी रहेगी जिसका लाभ विद्यार्थी वर्ग व आम जन को भी मिल पायेगा।



उपादेयता:


  • 1). जन्मपत्रिका का निर्माण तथा तत् संबंधी जानकारियां उपलब्ध कराने में वह समर्थ होगा, सरकार उन्हें उत्तरदायी ठहराये व मान्यता दे तो एक सही जन्मपत्री एक प्रकार से जन्म का प्रमाण पत्र हो जाती है।
  • 2). ग्रहों के प्रभावों का वैज्ञानिक स्वरूप खड़ा होगा तथा लोग एक सलाहकार के रूप में ज्योतिशी से अपने बच्चे के लिए कैसी षिक्षा उसके लिए उपर्युक्त होगी, ज्ञान प्राप्त कर सकते तथा अन्य मनोविज्ञानिकों के साथ साथ उसको भी विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर सकते है।
  • 3). आकाषीय घटनाओं के बारे में मौसम पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में तथा दीर्घकालीन प्राकृतिक प्रभावों के बारे में समाज को ज्ञान दे सकता है।
  • 4). व्यवसाय तथा व्यवसाय के संबंध में कौन कौन सी बातें व कौनसी उर्जाएं उसके चरित्र से मेल खाते हुए उसकी सहयोगी अथवा विरोधी होगी, की जानकारी उसे प्राप्त हो सकती है।
  • 5). व्यक्ति की षारीरिक क्षमताएं तथा ऊर्जाओं का ज्ञान प्राप्त कर यह निर्देष दिया जा सकता है कि आपको किस प्रकार के रोग की संभावनाएं हो सकती है इसके प्रति आपको सावधान होेने की आवष्यकता है।
  • 6). ज्योतिश संबंधी प्राचीन स्थल व वैधषालाएं है उनकी व्याख्या करना तथा समझना स्वयं में एक बहुत बड़ा काम है। देष एंव विदेष के पर्यटक जब जंतर मंतर जाते है तो गाइड़ लोग उन्हें कुछ समझा देते है जो वस्तुतः विशय से परे है, एक जानकार सही अर्थो में उसके बारे में जानकारी दे सकता है।
  • 7). मन्दिर वास्तु, महल-किले का वास्तु, नगर वास्तु विन्यास आदि की जानकारी रखने वाला सही सूचना देष विदेष के पर्यटकों को दे सकेगा।
  • 8). शुभ कार्य की षुरूआत षुद्ध उच्चारण सहित विधिपूर्वक अनुश्ठान के रूप में की जा सके। कौनसा कार्य कब किया जाय व कब निशेध या वर्जित है, की जानकारी दे सके।


शोध कार्य


संस्थान में कई विद्यार्थी ऐसे भी होंगे जो इन विधाओं का अध्ययन गहनता से करने और नवाचार की ओर बढ़ने में रुचि रखते होंगे। उनके लिए नए शोध कार्य करवाए जाएंगे तथा उनके नए-नए विशय पर अध्ययन हेतु षोध कार्य करवाया जाएगा।
शोध कार्य का निष्कर्ष व सार आम जनता व विद्वजनों तक पहुंच सके उसके लिए त्रैमासिक पत्रिका, मोनोग्राफ, लघु पुस्तक व पुस्तकों का प्रकाषन हो सके तथा संगोश्ठी, सम्मेलन तथा सेमिनार का आयोजन हो सके, इसकी व्यवस्था करनी चाहिए।
देश विदेश में इन पाठ्यक्रमों को आधार मान कई संस्थाएं कार्य कर रही हैं, उनके साथ मिल कर भी षोध कार्य, सेमिनार आदि किए जा सकते हैं।
इस शोधकार्य में धनराषि की आवष्यकता है। इसे प्रोजेक्ट व अन्य संस्था से या विष्वविद्यालय अपने लेवल पर इसे स्वीकृति प्रदान करे।



शोधकार्य में प्रायोगिक:-


  • 1). भविष्य में संस्थान द्वारा प्राचीन वेधषालाओं यथा जंतर-मंतर के आधार पर ज्योतिशीय अवलोकन व ग्रह गणित का ज्ञान किस रूप में हो सकतो है, जैसे धूप घड़ी, ग्रहण (सूर्य चंद्र) का ज्ञान आदि के लिए जो भी यंत्र है, उनका निर्माण करना आदि।
  • 2). एक कुण्डली बैंक की स्थापना तथा प्राचीन कुण्डलियों का संरक्षण व उनका अध्ययन किया जा रहा है। विशिष्ट व्यक्तियों की कुण्डली का विष्लेशण कर फलित में सिद्धान्तों से कई कुण्डलियों की सत्यता को परखना आदि कार्य षुरू कर दिया गया हैं।
  • 3). कई अभिलेखों में जो ज्योतिशीय संकेत या विष्लेशण दिए हुए होते हैं, उनकी सत्यता को जांचना व उनका काल निर्धारण में ज्योतिशीय तत्वों की उपयोगिता का महत्व समझाया जाने लगा हैं।
  • 4). साहित्य में भी ज्योतिशीय तत्वों का आंकलन करके उनके काल निर्धारण में अहम् भूमिका निभाई जा रही हैं।
  • 5). भारतीय संस्कृति में मंदिर वास्तु व प्राचीन जल संस्थान दुर्ग आदि के षिल्प स्थापत्य हेतु उनके वास्तु विन्यास पर रोचक जानकारी आम जनता तक पहुंचाना, संस्थान का प्रायोगिक क्षेत्र बन गया है।
  • 6). प्राचीन ज्योतिश वास्तु कर्मकाण्ड संबंधी पाण्डुलिपियों को सुरक्षित कर उनका पुनर्मुद्रण व हिन्दी में अनुवाद कर जन समाज के सामने लाना भी संस्थान का उद्देष्य रहेगा।
  • 7). ज्योतिर्विज्ञान की शोध पत्रिका (वार्षिक) पर कार्य शुरू हो चुका है।


पाठ्यसामग्री


पाठ्यक्रम अध्ययन हेतु स्वीकृत पाठ्यपुस्तकें बता दी गई तथा जन्मपत्री लेखन विधि के लिए एक वर्कबुक तैयार की गई जिसे विद्यार्थी लेकर उससे अभ्यास कर सकेंगे तथा ज्योतिश डिप्लोमा के सम्पूर्ण पाठ्यक्रम को कम्प्यूटराइज्ड टाइप करवा दिया गया है तथा अभी तक उनके नोट्स के रूप फोटोकाॅपी कराने का कहा जाता है। यदि उन्हीं नोट्स को टैक्स्ट बुक के रूप में छपा दिया जाए या लघु पुस्तकों के रूप में छाप कर निर्धारित षुल्क में दिया जा सकता है। वास्तु की भी अभ्यास पुस्तिका तैयार करवाई जा रही है। प्रोजेक्टर के माध्यम से जन्मपत्रिका के फलित का विष्लेशण सिखाया जाता है। वास्तु के गृह के नक्षों को भी प्रोजेक्टर के माध्यम से बताया जाता है। साथ ही मंदिर वास्तु के आंतरिक व बाहरी वास्तु विन्यास की भी स्मार्ट रूम के प्रोजेक्टर के माध्यम से जानकारी दी जाती है।



प्रायोगिक


ज्योतिश के प्रायोगिक में 21 मार्च व 23 सितम्बर को विशुव दिवस के रूप में अक्षांष-रेखांष व छायाज्ञान पलभा आदि का प्रायोगिक कार्य हर वर्श करवाया जाता है। आशाढ़ी पूर्णिमा के दिन वायु चलन तथा मावठ के दिन से वर्शा ज्ञान आदि प्रायोगिक कराए जाते हैं। एम.ए. पाठ्यक्रम के लिए द्वितीया के चंद्रमा का अध्ययन, सस्य विचार, वृश्टि विज्ञान, दुर्भिक्ष आदि का भी अध्ययन करवाया जाएगा। वास्तु में 10-25 घरों का निरीक्षण प्रतिवर्श करवाया जाता है तथा मंदिर वास्तु में अभी तक नागदा मंदिर, जगत मंदिर, आयड़ के गंगू कुण्ड, मीरां मंदिर, आयड़ सभ्यता संग्रहालय, जगदीष मंदिर, अमरखजी षिव मंदिर, एकलिंगजी मंदिर, बाईजीराज का कुण्ड, तोरण बावड़ी सहित कई मंदिर-बावड़ी पर ले जाकर प्रायोगिक अध्ययन कराया गया है।



सत्र: 2017-18



1). पाठ्यक्रम


इस संस्थान में सर्टीफिकेट पाठ्यक्रम का उद्देष्य यह है कि कोई भी विद्यार्थी ज्योतिश-वास्तु, पूजा पद्धति सीखकर अपना रोजगार षुरू कर सके। यदि किसी कारण वह 10वीं तक ही पढ़ सका है तब भी वह इन पाठ्यक्रम के माध्यम से जीवनयापन कर सकता है।



2). समय


संस्थान का समय अपराह्न 4 से 7 बजे तक रखा गया है। (यदि आवष्यक हुआ तो फेरबदल हो सकता है।)



3). पाठ्यक्रम पढ़ाने का समय


सभी पाठ्यक्रम के लिए प्रतिदिन का एक कालांष निर्धारित किया गया है। एक कालांष एक घंटा या 45 मिनट का मान्य किया गया है। प्रायोगिक के लिए यदि बाहर लेकर जाया जाता है तो कालांष 2 या 3 माने जाएंगे।



4). पाठ्यक्रम अध्ययन


संस्थान में 2 डिप्लोमा व 4 सर्टीफिकेट पाठ्यक्रम चल रहे हैं। प्रत्येक में एक कालांष प्रतिदिन अध्ययन कराया जाता है। संस्थान में विद्यार्थियों कोएक डिप्लोमा व एक सर्टीफिकेट में एक साथ एक ही वर्श में प्रवेष दिया जा सकता है यदि वह दो विशय पर एक अवधि में पढना चाहे तो इससे समय व धन की बचत विद्यार्थी को हो सकती है।



5). पुस्तकालय


संस्थान की षुरुआत से ही एक लघु पुस्तकालय बनाया हुआ है। करीब 800 से अधिक पुस्तकें ज्योतिश-वास्तु-कर्मकाण्ड-हस्तरेखा-अंक व भारतीय धर्म षास्त्र -संस्कृति आदि से संबंधित हैं। कुछ पुरानी किताबें व पाण्डुलिपियां भी षामिल की गई हैं जो कई ज्योतिशियों के घर से लाई गई हैं।



6). प्रायोगिक


ज्योतिश के प्रायोगिक में 21 मार्च व 23 सितम्बर को विशुव दिवस के रूप में अक्षांष-रेखांष व छायाज्ञान पलभा आदि का प्रायोगिक कार्य हर वर्श करवाया जाता है। आशाढ़ी पूर्णिमा के दिन वायु चलन तथा मावठ के दिन से वर्शा ज्ञान आदि प्रायोगिक कराए जाते हैं।